बुधवार, जनवरी 26

अपने हिस्से का नूर

कुछ दिनों पहले अपने अंग्रेजी ब्लॉग पर एक लेख के द्वारा मैंने कुछ प्रशन उठाये थे, जिनका उत्तर भूषण सर ने बड़ी खूबी से दिया, जिसे आप यहाँ देख सकते हैं. उनके उसी उत्तर से प्रेरित होकर ये कुछ पंक्तियाँ लिखीं हैं, इस उम्मीद के साथ के आम आदमी के पास एक बार फिर ये सन्देश पहुंचे की वो ही ख़ास आदमी है और उसे किसी चालाक सियार के बहकावे में आने कोई ज़रुरत नहीं है. उसके सीधेपन में ही इंसानियत और खुदाई की रिहाइश है.

ऐ इंसान, थम के टटोल तो ज़रा,
देख, वो रौशनी, वो खुशबु, तुझी में है कहीं 
वो अँधेरे जो आते हैं उजाले की शकल में, 
तेरे दिल की आवाज़ दबा ना दें कहीं

सियासत और ताकत जिनकी चाहत है,
मासूमों का लहू बहाना उनकी आदत है,
भूल जातें हैं की उनसे बड़ा भी एक है,
यह दुनिया जिसकी अमानत है
अभी भी वक़्त है सजदे में सर झुका दें यहीं  

ऐ खुदा, आम आदमी को बना दे ख़ास,
तेरा हर बन्दा अपनी अजमत पे कर सके नाज़,
हर एक लिये है अपने हिस्से का नूर ,
खोल दे ये दिलवालों पे राज़
महसूस करें तुझे दिल में, औरों पीछे भागें नहीं



आओ, उस नूर के उजाले में ढूंढे रास्ता अपना,
हमदिली जिस डगर हो, वो बने रास्ता अपना,
सख्त कलामी बन जाए जिस गली की रिवायत,
अदब से हम बदल लें रास्ता अपना
के कतरा-ऐ-नूर-ऐ-दिल बुझ ना जाए कहीं 

रास्ता एहम है तो चाल भी एहम है,
संभल के पाँओ रखिये की हर कदम एहम है,
मोहब्बत लाए करीब जिसके, नफरत करे दूर,
मुझे तो मेरा वो हमदम एहम है
अब करे गुमराह ऐसी कोई शै नहीं 

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