मंगलवार, जनवरी 18

इल्म की रस्साकशी

कभी चोट यूँ लगती है की नफरत हो जाती है,
बात यूँ बढती है की रिश्तों में गफलत हो जाती है
चलिए, दर्द के पार, माफ़ी के पास चलें
नफरत के दमन के लिये

आप सही हैं, आप जानते हैं, वो सही हैं, वो मानते हैं,
इल्म की रस्साकशी कितनी खिंच जाती है, ये सब जानते हैं,
आइये, मोहब्बत के डोरे से बाँध लें अपने-परायों को,
इल्म का इस्तेमाल हो अमन के लिये 

सही है के समझाना ज़रूरी है,
मगर क्या मामला इतना उलझाना ज़रूरी है?
प्यार-ओ-इज्ज़त से कही मुख़्तसर सी बात
मोअस्सर है यकीन-ऐ-मन के लिये

ईमान इंसान का, खुदा का फज़ल-ओ-रहम है
इसमें इंसानी काबलियत सिर्फ एक वहम है,
जब चाहेगा बुला लेगा जिसे चाहे
वो नमन के लिये
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