शनिवार, जनवरी 8

इंसानियत की ज़मानत की जाए

कश्मीर मसला हो या इजराइल-फिलिस्तीन की खुनी जंग या फिर इराक और अफ़ग़ानिस्तान में चल रहे युद्ध या फिर अफ्रीका में नरसंहार, हर तरफ दर्द ही दर्द है. क्यूँ कोई इनका हल नहीं ढूंढ पाता? या फिर हम ढूंढना ही नहीं चाहते? और सबसे बड़ी बात की हम खुद कितने ज़िम्मेदार हैं इन मसलों को बढावा देने के लिये या अपनी कौम, अपने धर्म, अपनी जिद्द के आगे दूसरों के जज़बातों को ना समझने के लिये? 
क्या ये सच नहीं की हममे से एक-एक ज़िम्मेदार है अपने चारों तरफ के माहोल के लिये? हममें से कितने लोग अपने आसपास अमन की बहाली की कोशिश करते हैं, अमन और प्यार की मिसाल बनने की कोशिश करते हैं? हमारी छोटी-छोटी दुनिया ही तो बड़ी दुनिया बनाती हैं. यह दुनिया बेचारी तो हम इंसानों से ही अपनी पहचान बनाती है 

दुनिया की क्या औकात है
जो उससे शिकायत की जाए,
अपनी नासमझी और खुदगर्ज़ी है
की जिनसे बगावत की जाए

 खुद ही मुसलसल दर्द देतें हैं खुद को,
इस फ़िराक में के उनके दर्द में मुनाफिअत की जाए 

कभी रोके ज़ख्म-ऐ-माज़ी, कभी झिझक तो कभी गुरूर    
कैसे इब्तिदा-ऐ-अमन की वकालत की जाए 

इतना जज़्बा के बदल जाता है वेह्शत में,
ऐसे में, किस तरह दरख्वास्त-ऐ-मोहब्बत की जाए?

इतनी मोहब्बत दे दिलों में, ऐ खुदा 
के कम से कम इंसानियत की ज़मानत की जाए

 क्यूँ सरहदों के मसले सुलझते नहीं?
कैसे सुकून से घरों में रहने की आदत की जाए?

एक टीस सी उठती है मेरे दिल में इंसानों की हरकतों पे
कोई बताए, इन्सां होकर कैसे इंसानों से अदावत की जाए?

खुदा भी करता होगा इंतज़ार उस वक़्त का,
के अंजाम-ऐ-तमाशा हो और क़यामत की जाए


कुर्बानी ही ज़रूरी है तो यह ही सही,


नफरत, खौफ, और खुद-पसंदी की शाहादत की जाए 

Photos: Google
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