मंगलवार, दिसंबर 21

ख़ामोशी

उनकी ख़ामोशी को समझना उनको समझने से भी मुश्किल काम है... 

क्या है यह ख़ामोशी? क्यूँ ये सुनाई सी देती है? ख़ामोशी जितनी लम्बी हो उतनी ही तेज़ सुनाई देती है, मगर इसकी आवाज़ में लफ्ज़ नहीं होते, यह सुबकती है, मुस्कुराती है, बुलाती है, लौटा भी देती है, मगर इस उम्मीद में रहती है की शायद कभी मर मिटेगी और लफ़्ज़ों में बयां होगी... 

ख़ामोशी में सब्र है, दर्द है ,
शरारत है, इकरार भी है,

इसी से तकरार संभलती है,
यही इज़हार-ऐ-तकरार भी  है

ये पनाह देती है राज़-ऐ-दिल को,
दिल पे ताला भी खुद है, खुद ही पहरेदार भी है 

कभी गुनगुनाती है ग़ज़ल बन कर,
कभी अंधेरों में खोया सूना दयार भी है

कहते हैं, एक चुप सौ बातों पे भारी,
मगर कभी शिकस्त-ओ-हार भी है

चिलमन-ऐ-ख़ामोशी में छिपे हैं सैंकड़ों एहसास,
जो पर्दाफाश होने को बेक़रार भी हैं

सुस्त माज़ी को सुला लेती है अपनी गोद में, 
कभी मुस्तकबिल के तूफ़ान की पयाम बार भी है

http://www.layoutsparks.com/1/182242/waiting-alone-girl-sad.html











यह वो दोशीज़ा है जिसे इंतज़ार-ऐ-रिवायत-ऐ-वफ़ा है
ख़ामोश है मगर टूट जाने को तैयार भी है 


मुस्तकबिल = Future 
पयाम बार = messenger 
दोशीज़ा = Damsel, Virgin 
रिवायत = Tradition 
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