रविवार, दिसंबर 12

पहली मोहब्बत तो पहली ही होती है

कोई कोई कविता बस आंसूओं के साथ झर-झर बह जाती है.... और शायद दर्द का कुछ हिस्सा भी अपने साथ ले जाती है... उंगली पकड़ के बचपन की मस्त दुनिया में ले जाती है... जैसे मेरी जड़ों में से कुछ मट्टी मेरे हाथ में दे जाती है....




कभी-कभी पुरानी तस्वीरों के ज़रिये
माज़ी की सैर पे निकल जाती हूँ,
उन पुरानी दीवारों के बीच उस दुनिया में,
अपनी उस साइकिल पे घुमने निकल जाती हूँ

पर अब सिर्फ साइकिल से काम नहीं चलता,
नाव भी ढूँढनी पड़ती है,
आंसूओं की एक लहर भी चलती हैं वहां पर,
हिम्मत की पतवार चलानी पड़ती है

याद है मुझे, जहां दीवारों से बाहर
झाँकने की कोशिश हुई,
वहीँ मेरी पहली मोहब्बत के
माथे पे सलवटें हुईं

पर ज्यूँ ही शरारतें अपने
पंख समेटतीं,
माथे से ज़रा नीचे आँखें
मुस्कुराने लगतीं

याद हैं जो झुमके मेरे लिये लाये थे तुम,
वो कहानियां जो खुद ही बना लेते थे तुम,
खट्टे-मीठे चुटकुलों से सबको हंसा देते थे तुम
सच है, ज़िन्दगी को अपनी शर्तों पे जीते थे तुम

फिर यकायक, 'आज' नज़र से
'बीते हुए कल' को चुरा लेता है,
पापा की हंसती हुई ऑंखें नहीं दिखती,
पर बेटे का चेहरा मुस्कुरा देता है

मगर पहली मोहब्बत तो
पहली ही होती है,
घिरी हूँ रहमत-ओ-खुशियों से
पर तुम्हारी कमी पूरी नहीं होती है

आज, तुम भी नहीं हो,
दीवारें भी नहीं हैं,
मगर बाहर झाँकूँ, ऐसी
क्वाहिश-ओ-नज़ारे भी नहीं हैं

अब तुम्हारी तस्वीरें ही रह गयीं हैं मेरे पास
कुछ कागज़ की, कुछ यादों की.
हाँ, तुम्हारा हुनर भी रह गया है,
मत्थे की सलवटों को बना लेती हूँ आँखों की हंसी
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    उसकी रूह से लिखी गयी थी किताब, इसमें कोई शक़ नहीं, मगर उसे किसी क़ायदे-ओ-क़िताब में बाँधने का, किसी को हक़ नहीं!