शुक्रवार, दिसंबर 10

नाराज़गी जितनी दिल में रखी जाए, उतनी ही भारी हो जाती है





हम सभी कभी न कभी किसी न किसी पे नाराज़ हुए होंगे. पर कभी कभी ये गुस्सा हमारी ज़िन्दगी में, हमारे दिलों में, हमारे रिश्तों में या हमारे नज़रिए में रह जाता है. कभी रिश्ते खराब करता है कभी सेहत. यहाँ यही गुज़ारिश है की गुस्से से निजात पायें, जिन हालातों या लोगों की वजह से नाराजगी की शुरुआत हुई, उन्हें बदलने की कोशिश करें या हम अपना नज़रिया बदलने की कोशिश करें और कुछ काम ना आए तो अपना रास्ता बदल लें... माफ़ी को गले लगाना, गुस्से को गले लगाने से कहीं बेहतर है...

नाराज़गी जितनी देर दिल में रखी जाए,
उतनी ही भारी हो जाती है,
दिल का बोझ बन जाती है,
सूखी-सूखी ज़िन्दगी बेचारी हो जाती है 

न जाने क्यूँ फिर भी 
इस बोझ को दिल से लगाए रहते हैं,
नाराज़गी की ता'बेदारी में
सर को झुकाए रहते हैं 

रूठना-मनाना जायज़ है
थोड़ा सा गुस्सा, थोड़ी सी माफ़ी,
ज़िन्दगी के ज़ाएके और मिजाज़ 
बदलने को काफी 

मगर लम्बी नाराज़गी,
ढेर सारा गुस्सा,
ना सेहत, ना रिश्ते,
ना दिल के चैन के लिये अच्छा 

http://lifehacker.com/5614548/venting-frustration-will-only-make-your-anger-worse
आँखें लाल, तमतमाता चेहरा,
उखड़े अंदाज़
कभी खामोश रंजिश 
कभी खुल्लमखुल्ला एतराज़ 

गुस्सा आना गलत नहीं,
रह जाना गलत है,
इसे दिल में दबा लेना भी गलत है,
इसमें बह जाना भी गलत है 


रुखसत हो जाए जो
एहसास-ऐ-नाराज़गी
ज़िन्दगी में आ जाए 
बहार-ओ-ताज़गी

गुस्सा बदले उस जज़्बे में,
जो बदले यूँ सूरत-ऐ-हाल,
कलम, मुस्कराहट, माफ़ी,   
गुफत-ओ-शानीद का हो इस्तेमाल





ता'बेदारी = Obedience
गुफत-ओ-शानीद  = Negotiation 
एक टिप्पणी भेजें

    उसकी रूह से लिखी गयी थी किताब, इसमें कोई शक़ नहीं, मगर उसे किसी क़ायदे-ओ-क़िताब में बाँधने का, किसी को हक़ नहीं!