शुक्रवार, नवंबर 26

बार-बार वही बात, बात को हल्का कर देती है

एहसासों का समंदर उनसे संभाला ना जाएगा,
इसलिए उसे दिल में संजोए रहते हैं 


तूफान को लफ़्ज़ों की शकल देके,
बूंद-बूंद रिसते रहते हैं


होंठों को आराम दिया करते हैं,
कलम को थकाए रहते हैं


सीधी बात कहीं रिश्तों को घायल ना कर दे,
शायरी में पनाह लिए रहते हैं


कभी-कभी बार-बार वही बात, बात को हल्का कर देती है 
अपनी दरख्वास्त को यूँ ख़ामोशी में डुबाए रहते हैं  


आरज़ू है जिसकी दिल को,
उसे दोनों हाथों से लुटाये रहते हैं 
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    उसकी रूह से लिखी गयी थी किताब, इसमें कोई शक़ नहीं, मगर उसे किसी क़ायदे-ओ-क़िताब में बाँधने का, किसी को हक़ नहीं!