शुक्रवार, नवंबर 19

छोटे-छोटे क़दमों का रिवाज़

उस बयाबाँ के पीछे एक बगीचा था,
ये नहीं पता था
दरख्तों के उस झुण्ड के पीछे गुलों का गलीचा था,
ये नहीं पता था 

डर के मुड़ जाया करती थी
जंगल से घबराया करती थी,
डर को भी डराने एक तरीका था
ये नहीं पता था

फिर छोटे-छोटे क़दमों का सीखा रिवाज़ नया,
एक नई पगडण्डी का आगाज़ हुआ,
हर कदम डर को हौसले में बदल सकता था
ये नहीं पता था  

अब कोई बयाबाँ कभी जो दिल जो डराता है,
हौसले को सिर्फ बगीचा ही नज़र आता है,
हौसला अपने दिल में ही कहीं छिपा था,
यह नहीं पता था
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