रविवार, नवंबर 14

हर इनकार ईमान हो जाता है

दिल टूटता तो है,
पर टूट के और बड़ा हो जाता है, 

हर ठोकर पर आह तो निकलती है ,
पर अगला कदम कुछ और होशिआर हो जाता है 

हमले का मकसद कुछ भी क्यूँ न हो,
हर हमले से हौसला कुछ और जवाँ हो जाता है 

राहेमंज़िल कितनी भी लम्बी हो,
इरादा पक्का हो तो सफ़र आसां हो जाता है 

कैद-खाना जिस्म रोक सकता है,
ख्याल सैलाखें तोड़ उड़न छू हो जाता है  

फज़ल उसका जब सेहरा को समंदर करता है 
हर इनकार ईमान हो जाता है 
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मुसलसल हलकी-हलकी हुड़क है, तेरी सम्त जाती मेरी हर सड़क है, मेरी कायनात का मरकज़ है तू आरज़ू शब-ओ-रोज़ है तेरी, तू माशूका नहीं,...