शनिवार, नवंबर 13

जज़्बात कुछ यूँ बयां होते हैं...



कभी कह के, कभी लिख के,
कभी आँखों से बयां होते हैं

कभी आंसूं, कभी तब्बसुम,
कभी स्याही से बयां होते हैं 

नहीं शहूर इन अल्हड़ जज़बातों को,
पर्दे को हवा कर के, बयां होते हैं

कभी बेबाक हैं, कभी शर्मीले से,
कभी इतराते हुए बयां होते हैं 

कभी शीशे में उतरते नज़र आते हैं,
कभी धुंध-ओ-धुंए में बयां होते हैं 

कभी तीरंदाजी करते हैं, कभी मल्ल्हम लगाते हैं,
हर अंदाज़ में बयां होते हैं 

दिल में छुपे रहते हैं तो गुबार बन जातें हैं,
राहत-ऐ-रूह है जब बयां होते हैं 

बड़ी वफ़ा से साथ निभाते हैं ज़िन्दगी का,
आखरी सांस तक बयां होते हैं 

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मुसलसल हलकी-हलकी हुड़क है, तेरी सम्त जाती मेरी हर सड़क है, मेरी कायनात का मरकज़ है तू आरज़ू शब-ओ-रोज़ है तेरी, तू माशूका नहीं,...