बुधवार, नवंबर 24

चल उठ, ज़िन्दगी, चलते हैं! -2

चल उठ, ज़िन्दगी,
चलते हैं!

सिर्फ अपने लिए जीना अधूरा सा लगता है
आ, तुझे जी भर के जीने,
चलते हैं

चाचा जी को अब दिखता नहीं,
चल, उन्हें अखबार सुनाने,
चलते हैं

कामवाली की लड़की फटे कपडे पहने है,
चल, उसे नई फ्राक दिलाने,
चलते हैं

पड़ोस की ताई का कोई नहीं रहा अब,
चल, उनको हंसाने,
चलते हैं

सामने की सड़क पे वो अक्सर भूखा सोता है,
चल, उसे खाना खिलाने,
चलते हैं

बड़े दिन हुए माँ को कुछ मीठा खिलाये,
चल, हलवा बनाने,
चलते हैं

लगता है, शिकवा दूर नहीं हुआ उनका,
चल, भाभी को मनाने,
चलते हैं

बच्चों से खेले बहुत वक़्त हुआ,
चल, दिल बहलाने,
चलते हैं

चिंता-परेशानी बहुत हुआ,
चल, कोई सपना सजाने,
चलते हैं

वक़्त आने पे अलविदा भी कह देंगे तुझे,
फिलहाल, पल पल को जीने,
चलते हैं
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    उसकी रूह से लिखी गयी थी किताब, इसमें कोई शक़ नहीं, मगर उसे किसी क़ायदे-ओ-क़िताब में बाँधने का, किसी को हक़ नहीं!