मंगलवार, अक्तूबर 26

और मिल मुझसे, और मुझे दीवाना बना

और मिल मुझसे,
और मुझे दीवाना बना
गर दीवानगी ही चलन है इस ज़माने का,
मुझे अपना दीवाना बना

कूचा-ऐ-दिल में कुछ कोने ऐसे भी हैं,
जहाँ तेरा आना जाना नहीं है,
वहां भी तो अपना आशियाना बना

कभी करीब आता है,
कभी खो सा जाता है,
हर पल का हो साथ, ऐसा दोस्ताना बना

ठिकाना हर सफ़र का, तू बन जाए,
हर नज़ारा नज़र का, तू बन जाए,
तू मुझे इस कदर दीवाना बना
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    उसकी रूह से लिखी गयी थी किताब, इसमें कोई शक़ नहीं, मगर उसे किसी क़ायदे-ओ-क़िताब में बाँधने का, किसी को हक़ नहीं!