गुरुवार, अक्तूबर 7

टूटे रिश्तों के टुकड़े

रिश्ते हंसातें हैं,
यही दिल दुखाते भी हैं,
कभी निभ जातें हैं आखरी सांस तक,
कभी पल में चटकते भी हैं

कभी जन्मों के, रस्मों के रिश्ते
सवाल बन के रह जातें हैं,
तो कहीं बेनामी, मुंहबोले रिश्ते,
हर सवाल का जवाब बन जातें हैं

रिश्ता रिश्तेदारों से नहीं,
दिल से होता है,
निबाह इनका एक अकेले से से नहीं
मिल के होता है

ढोओं ना रिश्तों को
जी लो इन्हें ,
उधड़े जो ज़रा भी यह प्यारे रिश्ते,
वक़्त रहते सी लो इन्हें

रिश्ते टूट तो जातें हैं,
पर कुछ टुकड़े दिल में छोड़ जातें हैं,
कुछ लोग रिश्तों के मोहताज नहीं होते
रहे ना रहे रिश्ता, वो दिल में रह जातें हैं
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    उसकी रूह से लिखी गयी थी किताब, इसमें कोई शक़ नहीं, मगर उसे किसी क़ायदे-ओ-क़िताब में बाँधने का, किसी को हक़ नहीं!