शुक्रवार, अक्तूबर 1

थोड़ा सा बुद्धू है...

मैं कहती नहीं,
फिर भी वो समझता है,
पर दिखाता नहीं.
की सब समझता है

बड़ा प्यारा सा खेल है,
आखों और मुस्कुराहटों का मेल है,
चुप-चुप चलती जज़बातों की रेल है,
जाने कैसे अनकहे एहसास
समझता है?

जितना बस में है, करता है,
अपनों के लिए करता है, गैरों के लिए करता है,
ऐसा इंसान कहाँ मिला करता है?
जो हर किसी को
अपना समझता है

क्या क्या बताऊँ जो उसने दिया,
बंद खिड़की खोल, मेरे सितारे का पता दिया
ना जाने कब मुझे मुझसे मिला दिया,
मुझसे ज़्यादा वो
मुझको समझता है

इतनी सहनशक्ति जाने कहाँ से लाता है,
गुस्सा जेब में रख कर, हंसी बांटता फिरता है,
खुद भी नहीं जानता की वो एक फ़रिश्ता है,
थोड़ा सा बुद्धू है, खुद को
मामूली इंसान समझता है
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