शनिवार, सितंबर 25

ऐ इंसानियत, तुझे मेरी परवाह ही नहीं!

डेमोक्रेटिक रेपुब्लीक ऑफ़ कांगो में लगभग ५०० औरतों के साथ हुए बलात्कार की खबर ने मुझे दो महीने पहले  'युगांडा रेड क्रोस' के एक कार्यकर्ता  से हुए एक वार्तालाप की याद दिला दी. उन्होंने बताया की वो उन लोगों के साथ काम करते हैं जो रवांडा में हो रहे अत्याचार से भाग कर युगांडा में शरण लेने की कोशिश करते हैं. कुछ लोगों को शरण मिलती है और कुछ को नहीं. जब एक सताई हुई महिला को सीमा पार करने की मंज़ूरी नहीं मिली तो वो बोली की वो जानती है की उसे रोज़-रोज़ के शोषण और बलात्कारों से कोई नहीं बचा सकता पर कम से कम उसे गर्भपात के लिए ही मदद मिल जाए. वो अपने दर्द और उसकी यादों को पालना नहीं चाहती थी....

इस दुनिया में बहुत सी ऐसी महिलायें हैं जो अगुवा कर ली जातीं हैं और गुलामी, शोषण, भूख और बीमारियों से भरी ज़िन्दगी जीने को मजबूर हो जातीं हैं. रवांडा की उस बहन और दुनिया भर में उसके जैसी कई बहनों  को समर्पित ये कुछ पंक्तियाँ लिखीं हैं...

रोती भी नहीं, चिल्लाती भी नहीं,
जानती है, कोई सुनेगा ही नहीं


सर पर छत, पेट भर खाना,
आदत भी नहीं, कोई आस भी नहीं


बारम्बार बलात्कार के अंधेरों में,
इंसान और हैवान में फर्क दिखता ही नहीं 


हौसला बहुत है उसके पास,
पिटती है, नुचती है, टूटती ही नहीं


बच्चे, माँ-बाप, भाई-बहन,
जिंदा हैं या मर गए, कुछ पता ही नहीं 


छीन लेती है साँसों को लूटेरों के बीजों से,
टूटे हुए दिल में, ममता के लिए जगह ही नहीं


बहुत दर्द है उसकी दस्ताने-ज़िन्दगी में,
कोई सुनने वाला ही नहीं


उठ कर, खड़ी होना चाहती है अपने पैरों पर,
कोई हाथ देने वाला भी नहीं


झुकी पलकों में आंसूं, कपड़ों में ढकें ज़ख्म जैसे कह रहे हों,
"ऐ इंसानियत, तुझे मेरी परवाह ही नहीं!"
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