गुरुवार, सितंबर 23

ना खेलो इन हर्फों से लापरवाही से

हर्फ़ मोतियों की तरह हर तरफ बिखरे हैं,
हर मोती की अपनी अदा है,
जुड़ जाएँ तो जवाहरात-ऐ- ख्याल हैं,
यह हर्फ़ ही तो पैगम्बर-ऐ-खुदा है

ना खेलो इन हर्फों से लापरवाही से,
इन्हें लफ़्ज़ों में बदलो दानाई से,
फिर लफ़्ज़ों को चुनो बड़ी सफाई से,
लफ्ज़ जो जोड़े दिलों को, उन्ही में रिहाइश-ऐ-खुदा है

अक्सर इन मोतियों की दुनिया में आ जाती हूँ,
नई-नई तरकीबों से इन्हें सजाती हूँ,
हर्फों को लफ़्ज़ों में, लफ़्ज़ों को शेरों में पिरोती हूँ,
यह शायरी बड़ी खूबसूरत बरकत-ऐ-खुदा है
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