गुरुवार, सितंबर 9

कभी साथ बैठें तो हमदिली से बातें हों

ज़रूरी नहीं की जब हम सही हों,
तो वो गलत ही हों,

आमने-सामने से तो सिक्के के अलग-अलग पहलु ही दिखते हैं,
कभी साथ बैठें तो हमदिली से बातें  हों

गुस्से से तो अक्सर बात बिगड़ ही जाती है,
कभी नज़र मिलाइए जब वो मुस्कुराते हों,

मिट्ठाइयां ज़रा और मीठी हो जातीं हैं,
जब दिवाली और ईद मिल के मनाते हों

अपने लिए तो इबादतगाह सब बनाते लेते हैं,
इंसानियत तो तब है जब हिन्दू मज्जिदें और मुसलमा मंदिर बनाते हों
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दिल्ली, सर चढ़ा है तेरा जादू

मुसलसल हलकी-हलकी हुड़क है, तेरी सम्त जाती मेरी हर सड़क है, मेरी कायनात का मरकज़ है तू आरज़ू शब-ओ-रोज़ है तेरी, तू माशूका नहीं,...