रविवार, सितंबर 5

अन्दर कहीं अभी भी बच्ची हूँ मैं

जानती हूँ की बड़ी हो गयी हूँ मैं,
लेकिन अन्दर कहीं, अभी भी बच्ची हूँ मैं

रात के अँधेरे से अभी भी डर जाती हूँ,
बच्चों के साथ मसकरी में सब भूल जाती हूँ,
पुराने दोस्तों के लिए आज भी मचलती हूँ मैं
अन्दर कहीं, अभी भी बच्ची हूँ मैं


बड़ो के जैसे बातें तो कर लेती हूँ, पर सब समझ नहीं पाती,
रात की नींद जिस गुस्से को भगा ना पाए, वो पचा नहीं पाती,
सुबह की ओस जहाँ मन का मैल धो दे, अभी भी उसी ज़मीन पे चलती हूँ मैं
अन्दर कहीं अभी भी बच्ची हूँ मैं 




http://vrinittogether.blogspot.com/2010/05/jaanti-hoon-ki-badi-ho-gayi-hoon-main.html
एक टिप्पणी भेजें

    उसकी रूह से लिखी गयी थी किताब, इसमें कोई शक़ नहीं, मगर उसे किसी क़ायदे-ओ-क़िताब में बाँधने का, किसी को हक़ नहीं!