शनिवार, सितंबर 4

कब तक तकते रहेंगे उस हिस्से को जो ख़ाली रह गया

कब तक  तकते रहेंगे उस हिस्से को जो ख़ाली रह गया,
वक़्त के दरिया में वो राही कब का बह गया,
अरसा हुआ जब रेत का वो खूबसूरत मंज़र डह गया,
आगे बड़ें अब समेट के उस जीवन को जो बिखर के रह गया 
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दिल्ली, सर चढ़ा है तेरा जादू

मुसलसल हलकी-हलकी हुड़क है, तेरी सम्त जाती मेरी हर सड़क है, मेरी कायनात का मरकज़ है तू आरज़ू शब-ओ-रोज़ है तेरी, तू माशूका नहीं,...