शनिवार, सितंबर 4

कब तक तकते रहेंगे उस हिस्से को जो ख़ाली रह गया

कब तक  तकते रहेंगे उस हिस्से को जो ख़ाली रह गया,
वक़्त के दरिया में वो राही कब का बह गया,
अरसा हुआ जब रेत का वो खूबसूरत मंज़र डह गया,
आगे बड़ें अब समेट के उस जीवन को जो बिखर के रह गया 
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    उसकी रूह से लिखी गयी थी किताब, इसमें कोई शक़ नहीं, मगर उसे किसी क़ायदे-ओ-क़िताब में बाँधने का, किसी को हक़ नहीं!