रविवार, अगस्त 29

लफ्ज़ बुनने लगती हूँ

जब जज़्बात उमड़ने लगते हैं,
लफ्ज़ बुनने लगती हूँ

कभी मुस्कराहट की शकल बनाती हूँ,
कभी आसूओं के नमूने बुनने लगती हूँ

कभी कोई रंग हाथ आता है, कभी कोई,
रंगों का ताना-बाना बुनने लगती हूँ

यह जज्बातों का धागा तो ज़िन्दगी के साथ ही ख़त्म होगा,
कहीं फिर उलझ ना जाए,  यही सोच लफ्ज़ बुनने लगती हूँ
एक टिप्पणी भेजें

मेरी कलम

  पहले लिखा करती थी, आजकल नहीं लिखती, पड़ी रहती है थकी-थकी सी, सेहमी सी, यह कलम, आजकल नहीं लिखती।  बहोत बोझ है कन्धों पे इन दिनों,, ...