शुक्रवार, जुलाई 30

उसकी तख्लीक़ को तेरे-मेरे में बांटते रहते हैं


कहते हैं की खुदा रौशनी है,
पर आराम अँधेरे में करना पसंद करते हैं,
कहते  हैं की खुदा मोहब्बत है,
पर आपसी जंग का बाईस उसे बताते हैं

मोहब्बत और मुआफी का ज़िम्मा उसे दे रखा है,
खुद नफरतों के मुसलसल तमाशों को हवा देते रहते हैं, 
कहते तो हैं के वो ही सबका बनानेवाला  है,
मगर उसकी तख्लीक़ को तेरे-मेरे में बांटते रहते हैं 

दुआ में अपनी तो कह देते हैं,
उसे क्या कहना है, यह किसको पड़ी है,
कहाँ है वो, क्या चाहता है,
लगता है यह बात उनकी समझ से परे है 

- गुड़िया
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